Tuesday, February 10, 2015

संवेदनाएं हो रही हैं खत्म : तेजिन्दर



पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान समारोह में वरिष्ठ पत्रकार विनय उपाध्याय का सम्मान
भोपाल, 07 फरवरी। हम बहुत ही कठिन समय में जी रहे हैं, यह हमें याद रखना चाहिए। वर्तमान समय में लोगों की संवेदनाएं खत्म हो रही हैं, यह गंभीर बात है। मीडिया की भी यही स्थिति है। मीडिया के लिए भूख और गरीबी कोई खबर नहीं है। उसकी सारी खबरें राजनीति, क्रिकेट, बॉलीवुड और फैशन के इर्द-गिर्द हैं। ये विचार प्रख्यात उपन्यासकार तेजिन्दर ने व्यक्त किए। मीडिया विमर्श के तत्वावधान में आयोजित पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान समारोह में वे बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने की। उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद जगदम्बिका पाल भी विशिष्ट अतिथि के नाते उपस्थित थे। सम्मान समारोह में आठवां पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान-2015 'कला समय' और 'रंग संवाद' के संपादक विनय उपाध्याय को दिया गया।
            साहित्यकार श्री तेजिन्दर ने कहा कि बाजारवाद के प्रभाव से साहित्य को किनारे किया जा रहा है। हमारी भाषा, शैली और शब्दों पर कार्पोरेट ने कब्जा कर लिया है। कार्पोरेट बड़ी चालाकी से साहित्य का इस्तेमाल अपने उत्पाद को बेचने में कर रहा है, लेकिन उसे साहित्यकार की संवेदनाओं की परवाह नहीं है। आज शब्द की सत्ता पर सबसे अधिक खतरा है। साहित्यिक पत्रिकाओं के मुकाबले फैशन की पत्रिकाएं अधिक हैं। आर्थिक पत्रिकाओं की भी संख्या ज्यादा है। उन्होंने बताया कि प्रकाशकों और पूंजीपतियों ने लेखकों की संवेदनाओं का दुरुपयोग करने के नए तरीके इजाद कर लिए हैं। उनके जाल में मध्यमवर्गीय लेखक धंसता जा रहा है। ऐसे दौर में मीडिया विमर्श पत्रिका ने साहित्यिक पत्रकारिता का सम्मान कर एक सकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश की है।
संसद नहीं कर सकती, वे काम मीडिया ने किए : सांसद जगदम्बिका पाल
उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के सांसद जगदम्बिका पाल ने कहा कि पत्रकारिता के उद्देश्य से भटकने की बहस के बीच आज भी पत्रकारिता की भूमिका और प्रभाव को उपेक्षित नहीं किया जा सकता है। जनधारणा है कि आज भी जो काम संसद नहीं कर सकी है, वे सब काम पत्रकारिता ने किए हैं और कर रही है। संसद की कार्यवाही के एजेंडा तक पत्रकारों के समाचार और लेख से तय हो जाते हैं। भोपाल को कला-संस्कृति का केन्द्र बताते हुए उन्होंने कहा कि देश की राजनीतिक राजधानी दिल्ली है, आर्थिक राजधानी मुम्बई है तो सांस्कृतिक राजधानी भोपाल है। उन्होंने कहा कि आज के समय में मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। आप किसी भी प्रकार के ट्रायल से बच सकते हैं लेकिन मीडिया ट्रायल से नहीं। भारतीय पत्रकारिता ने कई घोटाले उजागर किए हैं। समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण भी मीडिया कर रहा है। 
विमर्श से समाज का बौद्धिक विकास : प्रो. बृजकिशोर कुठियाला
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि समाज का बौद्धिक विकास विमर्श से होता है। लेकिन, विमर्श की दिशा क्या हो, यह साहित्यकारों और प्रबुद्धवर्ग को गंभीर चिंतन कर तय करनी चाहिए। शब्द ब्रह्म भी है और भ्रम भी। विमर्श के माध्यम से हमें समाज में ऐसा जागरण लाना चाहिए कि लोग शब्द के भ्रम से बच सकें। शब्द के माध्यम से जोडऩे का प्रयास होना चाहिए, तोडऩे का नहीं। बौद्धिक विमर्शों के माध्यम से हमें यह प्रयास करना चाहिए कि शब्द भ्रम का मायाजाल खड़ा न हो पाए। उन्होंने कहा कि शब्द का व्यापार होने लगे तो कहीं न कहीं समाज का नुकसान है। प्रो. कुठियाला ने कहा कि बौद्धिक पत्रिकाओं की आज भी जरूरत है। शोध ने यह सिद्ध किया है कि 70 प्रतिशत परिवारों में साहित्यिक पत्रिकाओं को पढ़ा जा रहा है।
सार्थक कोशिशों का सम्मान है : वरिष्ठ पत्रकार विनय उपाध्याय
समारोह में वरिष्ठ साहित्यिक पत्रकार विनय उपाध्याय को शॉल-श्रीफल और सम्मान निधि से सम्मानित किया गया। पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित होने के अवसर पर श्री उपाध्याय ने कहा कि यह मेरा नहीं बल्कि साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में सार्थक कोशिशों का सम्मान है। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता के पुरोधा माखनलाल चतुर्वेदी की कर्मभूमि खण्डवा में पढ़ाई के दौरान साहित्यिक पत्रकारिता के बीज मेरे हृदय में पड़े। भोपाल आकर मैंने असल मायने में साहित्यिक पत्रकारिता को जाना। शुरुआत में मुझे हतोत्साहित करने का प्रयास भी किया गया लेकिन बाद में सबने मेरे प्रयासों की सराहना की। श्री उपाध्याय ने बताया कि पहले मुख्यधारा के समाचार-पत्रों में साहित्यिक पत्रकारिता के लिए पर्याप्त स्थान दिया जाता था, जो वर्तमान में गायब हो गया है। यह समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
सरकार करे साहित्यिक पत्रकारिता का संरक्षण : वरिष्ठ पत्रकार कमल भुवनेश
कमोडिटीज कंट्रोल डॉट कॉम के सम्पादक कमल भुवनेश ने कहा कि पत्रकारिता में खबरों को उत्पाद की तरह बेचने की जो प्रवृत्ति आई है, उसने कहीं न कहीं पत्रकारिता और समाज दोनों का नुकसान किया है। इलेक्ट्रोनिक चैनल्स की बाढ़ आ गई है। लेकिन, इन चैनल्स का दृष्टिकोण राष्ट्रहित न होकर व्यावसायिक हित तक ही सीमित है। किस खबर को बेचा जा सकता है, यह ही ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पूंजीपतियों ने समाचार पत्र-पत्रिकाओं को उत्पाद बनाकर बेचने पर जोर दिया है, इसीलिए उन्होंने अपनी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाएं बंद कर दी हैं। श्री भुवनेश ने कहा कि समाज हित में सरकार को साहित्यिक पत्रकारिता का संरक्षण करना चाहिए। साहित्यिक पत्रिकाओं को मुख्यधारा के समाचार पत्रों की तरह सुविधाएं देनी चाहिए।
परंपराओं और लोक कलाओं पर आक्रमण का समय : साहित्यकार गिरीश पंकज
वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज ने कहा कि यह हमारी परंपराओं, संस्कृति और लोक कलाओं पर आक्रमण का समय है। पेरिस में चार्ली एब्दो पर हमला वैश्विक आतंकवाद का सबसे घृणित चेहरा है। यह बताता है कि किस तरह अभिव्यक्ति पर खतरा है। यह प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। हम जिस प्रकार की पत्रकारिता करें, उसके केन्द्र में मनुष्य होना चाहिए। समाज में सकारात्मक विचारों को बढ़ाने के लिए हमें कलम चलानी चाहिए। उन्होंने पश्चिम के नाम पर चल रही अंधानुकरण पर भी सवाल खड़े किए। श्री पंकज ने कहा कि अब बस्तर में भी बाजार घुस आया है। जिसके कारण हमारी मौलिकता खत्म हो रही है। पारंपरिक गीत-संगीत गायब हो गया है। पहनावा भी पश्चिमी हो गया है। कार्यक्रम में स्वागत भाषण पत्रिका के संपादक डॉ. श्रीकांत सिंह ने भी दिया। निर्णायक मण्डल की ओर से प्रतिवेदन सृजनगाथा डॉट कॉम के सम्पादक जयप्रकाश मानस ने पढ़ा। उन्होंने कहा कि बाजार और वैश्वीकरण के इस दौर में साहित्यिक पत्रकारिता को बचाने का प्रयास है, पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिल भारतीय साहित्यिक सम्मान। पत्रकारिता की मुख्यधारा की पत्रिका होकर मीडिया विमर्श के इन प्रयासों से साहित्यिक पत्रकारिता को बढ़ावा मिल रहा है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुभद्रा राठौर ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ. सौरभ मालवीय ने किया। पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए। इस मौके पर भोपाल के प्रबुद्ध लोग मौजूद थे। देशभर से भी बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी आए थे।

Thursday, December 18, 2014

विनय उपाध्याय को पं.बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिलभारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान

मीडिया विमर्श के आयोजन में 7 फरवरी को होंगे अलंकृत 
भोपाल। हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिलभारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘कला समय’ (भोपाल) के संपादक श्री विनय उपाध्याय  को दिया जाएगा।श्री विनय उपाध्याय  साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ देश के जाने-माने संस्कृतिकर्मी एवं लेखक हैं। जनवरी,1998 से वे कला-संस्कृति पर केंद्रित महत्वपूर्ण पत्रिका ‘कला समय’ का संपादन कर रहे हैं।
       पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव,  रमेश नैयर, डा. सच्चिदानंद जोशी, डा.सुभद्रा राठौर और जयप्रकाश मानस शामिल हैं। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज(गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज, सद्भावना दर्पण (रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज और व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा. प्रेम जनमेजय को दिया जा चुका है। त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिलभारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रूपए, शाल, श्रीफल, प्रतीकचिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है। सम्मान कार्यक्रम 7, फरवरी, 2015 को गांधी भवन, भोपाल में सायं 5 बजे आयोजित किया गया है। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्कार, बुद्धिजीवी और पत्रकार हिस्सा लेगें। इस अवसर पर ‘मीडिया और मूल्यबोध’ विषय पर व्याख्यान भी आयोजित किया गया है।
कौन हैं विनय उपाध्यायः ­ 
साहित्य,संस्कृति और कला पत्रकारिता में विगत 25 वर्षों से समान सक्रिय। दैनिक भास्कर और नई दुनिया समाचार समूह में लम्बी सम्बद्धता के बाद इन दिनों दो सांस्कृतिक पत्रिकाओं "कला समय" और "रंग संवाद" का सम्पादन और अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता के लिए अनेक प्रादेशिक और राष्ट्रीय सम्मानो से विभूषित। जनवरी 1998 में कला और विचार की द्वैमासिक हिंदी पत्रिका  "कला समय" का सम्पादन आरम्भ। साहित्य और कला जगत से जुडी अनेक विभूतियों और घटना-प्रसंगों पर दस्तावेज़ी  अंकों का प्रकाशन। उनके द्वारा संपादित कलासमय पत्रिका माधवराव सप्रे समाचार पत्र और शोध संस्थान द्वारा रामेश्वर गुरु पुरूस्कार से सम्मानित। भारत सहित विदेशों में भी शोध-अध्ययन के लिए कला समय सन्दर्भ पत्रिका के बतौर मान्य। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर और कंठ संगीत में विशारद। देश भर की  पत्र -पत्रिकाओं में सांस्कृतिक विषयों पर नियमित स्तम्भ और समसामयिक कला मुद्दों पर आलेख और टिप्पणियों का प्रकाशन। दूदर्शन के लिए अनेक वृत्तचित्रों का आलेख और पार्श्व स्वर तथा संगीत-नृत्य के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समारोहों के संचालन का सीधा प्रसारण। कई निजी प्रतिष्ठानो द्वारा निर्मित दृश्य-श्रव्य प्रस्तुतियों का संचालन। बतौर कला समीक्षक देश के विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक यात्राएं और अखबारों के लिए विशेष रिपोर्टिंग। कविता लेखन और संगीत  में भी विशेष  रूचि। प्रसार भारती द्वारा गणतंत्र दिवस के प्रतिष्ठित सर्व भाषा कविता सम्मलेन हेतु हिंदी के युवा कवि बतौर बनारस में शिरकत। मधुकली वृन्द द्वारा जारी संगीत अलबमों में गायक स्वर। एक  दर्जन से भी ज्यादा साहित्यिक -सांस्कृतिक संस्थाओं के मानद सदस्य। इन दिनों आईसेक्ट युनिव्हर्सिटी से सम्बद्ध वनमाली सृजन पीठ के राज्य समन्वयक। एक दशक पहले मॉरीशस का साहित्यिक प्रवास।

Thursday, December 11, 2014

मीडिया विमर्श का नया अंक एकात्म मानववाद पर केन्द्रित

एकात्म मानववाद के 50 वर्ष पूरे होने पर मीडिया विमर्श का वार्षिकांक  'भारतीयता का संचारकहो रहा है चर्चित
भोपाल 11 दिसंबर जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका 'मीडिया विमर्शका नवीनतम अंक 'भारतीयता का संचारक' बाजार में आते ही राजनीति और मीडिया के क्षेत्र में चर्चित हो गया है। राष्ट्रवादी विचारधारा के स्तम्भ पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन और पत्रकारीय कौशल पर उम्दा सामग्री इस अंक में है। उनके विचार दर्शन 'एकात्म मानववादको 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसलिए पत्रिका का यह अंक खास और चर्चित हो रहा है। पत्रिका अपने आठ वर्ष पूर्ण कर नवें साल में प्रवेश कर रही है और यह उसका वार्षिकांक है।
            मीडिया विमर्श के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने बताया कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय राजनीति को एक दिशा दी थी। यही नहीं वे कुशल संचारक भी थे। सही मायने में पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीयता के संचारक थे। उनके जीवन के इस पहलू पर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा नहीं गया है। जनसंचार के क्षेत्र से जुड़े लोग भारतीयता के संचारक के नाते दीनदयालजी के संबंध में अध्ययनलेखनविश्लेषण और शोध करेंइस उद्देश्य को ध्यान में रखकर मीडिया विमर्श का अक्टूबर-दिसम्बर अंक सबके सामने है। श्री द्विवेदी ने बताया कि दुनिया में अलग-अलग समय में अनेक विचारकों ने देशकाल और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कई विचारधाराओं का प्रतिपादन किया। लेकिनये सब पूर्ण नहीं है। दीनदयालजी ने मनुष्य की संपूर्णता का चिंतन करते हुए एकात्म मानववाद का प्रतिपादन किया। एकात्म मानववाद को पचास साल पूरे हो रहे हैं। यह भी एक कारण है कि हमने दीनदयाल जी के पत्रकारिता में योगदान के साथ-साथ एकात्म मानववाद से संबंधित सम्पूर्ण सामग्री को मीडिया और राजनीति से जुड़े लोगों के सामने लाने का निर्णय लिया।
            मीडिया विमर्श का यह वार्षिकांक चार खण्डों में विभक्त है। पहले खण्ड में संचार और मीडिया के क्षेत्र में उनके योगदान पर समृद्ध सामग्री है। इस खण्ड में डॉ. वेदप्रताप वैदिकदेवेन्द्र स्वरूपडॉ. नंदकिशोर त्रिखाडॉ. महेशचंन्द्र शर्मा और गिरीश उपाध्याय सहित अन्य विद्वानों के लेख शामिल हैं। दूसरा खण्ड दस्तावेज है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकरनानाजी देशमुखडॉ. सम्पूर्णानंद के दीनदयालजी के संबंध में लिखे लेखों-भाषणों का संकलन किया गया है। तीसरे खण्ड में एकात्म मानववाद के विषय में दीनदयाल जी के व्याख्यानों का संकलन है। चौथे खण्ड 'विचार दर्शन में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंहमाखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियालाकुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति डॉ. सच्चिदानंद जोशीजितेन्द्र बजाजबजरंगलाल गुप्ताजगदीश उपासनेरमेश नैयरइंदुमति काटदरे सहित अन्य विद्वानों के लेख प्रकाशित हैं।
 प्रस्तुतिः लोकेंद्र सिंह

Saturday, December 6, 2014

भारतीयता का संचारक


एकात्म मानवदर्शन के पचास साल पूरे होने पर ‘मीडिया विमर्श’ का वार्षिकांक... भारतीयता के संचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी को समर्पित. पूरा अंक पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक कीजिये...