Tuesday, November 29, 2011

ममता को सराहौं या सराहौं रमन सिंह को


नक्सलवाद के पीछे खतरनाक इरादों को कब समझेगा देश
-संजय द्विवेदी
नक्सलवाद के सवाल पर इस समय दो मुख्यमंत्री ज्यादा मुखर होकर अपनी बात कह रहे हैं एक हैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और दूसरी प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। अंतर सिर्फ यह है कि रमन सिंह का स्टैंड नक्सलवाद को लेकर पहले दिन से साफ था, ममता बनर्जी अचानक नक्सलियों के प्रति अनुदार हो गयी हैं। सवाल यह है कि क्या हमारे सत्ता में रहने और विपक्ष में रहने के समय आचरण अलग-अलग होने चाहिए। आप याद करें ममता बनर्जी ने नक्सलियों के पक्ष में विपक्ष में रहते हुए जैसे सुर अलापे थे क्या वे जायज थे?
मुक्तिदाता कैसे बने खलनायकः आज जब इस इलाके में आतंक का पर्याय रहा किशन जी उर्फ कोटेश्वर राव मारा जा चुका है तो ममता मुस्करा सकती हैं। झाड़ग्राम में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में सैकड़ों की जान लेने वाला यह खतरनाक नक्सली अगर मारा गया है तो एक भारतीय होने के नाते हमें अफसोस नहीं करना चाहिए।सवाल सिर्फ यह है कि कल तक ममता की नजर में मुक्तिदूत रहे ये लोग अचानक खलनायक कैसे बन गए। दरअसल यही हमारी राजनीति का असली चेहरा है। हम राजनीतिक लाभ के लिए खून बहा रहे गिरोहों के प्रति भी सहानुभूति जताते हैं और साथ हो लेते हैं। केंद्र के गृहमंत्री पी. चिदंबरम के खिलाफ ममता की टिप्पणियों को याद कीजिए। पर अफसोस इस देश की याददाश्त खतरनाक हद तक कमजोर है। यह स्मृतिदोष ही हमारी राजनीति की प्राणवायु है। हमारी जनता का औदार्य, भूल जाओ और माफ करो का भाव हमारे सभी संकटों का कारण है। कल तक तो नक्सली मुक्तिदूत थे, वही आज ममता के सबसे बड़े शत्रु हैं । कारण यह है कि उनकी जगह बदल चुकी है। वे प्रतिपक्ष की नेत्री नहीं, एक राज्य की मुख्यमंत्री जिन पर राज्य की कानून- व्यवस्था बनाए रखने की शपथ है। वे एक सीमा से बाहर जाकर नक्सलियों को छूट नहीं दे सकतीं। दरअसल यही राज्य और नक्सलवाद का द्वंद है। ये दोस्ती कभी वैचारिक नहीं थी, इसलिए दरक गयी।
राजनीतिक सफलता के लिए हिंसा का सहाराः नक्सली राज्य को अस्थिर करना चाहते थे इसलिए उनकी वामपंथियों से ठनी और अब ममता से उनकी ठनी है। कल तक किशनजी के बयानों का बचाव करने वाली ममता बनर्जी पर आरोप लगता रहा है कि वे राज्य में माओवादियों की मदद कर रही हैं और अपने लिए वामपंथ विरोधी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही हैं लेकिन आज जब कोटेश्वर राव को सुरक्षाबलों ने मुठभेड़ में मार गिराया है तो सबसे बड़ा सवाल ममता बनर्जी पर ही उठता है। आखिर क्या कारण है कि जिस किशनजी का सुरक्षा बल पूरे दशक पता नहीं कर पाये वही सुरक्षाबल चुपचाप आपरेशन करके किशनजी की कहानी उसी बंगाल में खत्म कर देते हैं, जहां ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनी बैठी हैं? कल तक इन्हीं माओवादियों को प्रदेश में लाल आतंक से निपटने का लड़ाका बतानेवाली ममता बनर्जी आज कोटेश्वर राव के मारे जाने पर बयान देने से भी बच रही हैं। यह कथा बताती थी सारा कुछ इतना सपाट नहीं है। कोटेश्लर राव ने जो किया उसका फल उन्हें मिल चुका है, किंतु ममता का चेहरा इसमें साफ नजर आता है- किस तरह हिंसक समूहों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने राजनीतिक सफलताएं प्राप्त कीं और अब नक्सलियों के खिलाफ वे अपनी राज्यसत्ता का इस्तेमाल कर रही हैं। निश्चय ही अगर आज की ममता सही हैं, तो कल वे जरूर गलत रही होंगीं। ममता बनर्जी का बदलता रवैया निश्चय ही राज्य में नक्सलवाद के लिए एक बड़ी चुनौती है, किंतु यह उन नेताओं के लिए एक सबक भी है जो नक्सलवाद को पालने पोसने के लिए काम करते हैं और नक्सलियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं।
छत्तीसगढ़ की ओर देखिएः यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं कि देश के मुख्यमंत्रियों में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने इस समस्या को इसके सही संदर्भ में पहचाना और केंद्रीय सत्ता को भी इसके खतरों के प्रति आगाह किया। नक्सल प्रभावित राज्यों के बीच समन्वित अभियान की बात भी उन्होंने शुरू की। इस दिशा परिणाम को दिखाने वाली सफलताएं बहुत कम हैं और यह दिखता है कि नक्सलियों ने निरंतर अपना क्षेत्र विस्तार ही किया है। किंतु इतना तो मानना पड़ेगा कि नक्सलियों के दुष्प्रचार के खिलाफ एक मजबूत रखने की स्थिति आज बनी है। नक्सलवाद की समस्या को सामाजिक-आर्थिक समस्या कहकर इसके खतरों को कम आंकने की बात आज कम हुयी है। डा. रमन सिंह का दुर्भाग्य है कि पुलिसिंग के मोर्चे पर जिस तरह के अधिकारी होने चाहिए थे, उस संदर्भ में उनके प्रयास पानी में ही गए। छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक पुलिस महानिदेशक रहे एक आला अफसर, गृहमंत्री से ही लड़ते रहे और राज्य में नक्सली अपना कार्य़ विस्तार करते रहे। कई बार ये स्थितियां देखकर शक होता था कि क्या वास्तव में राज्य नक्सलियों से लड़ना चाहता है ? क्या वास्तव में राज्य के आला अफसर समस्या के प्रति गंभीर हैं? किंतु हालात बदले नहीं और बिगड़ते चले गए। ममता बनर्जी की इस बात के लिए तारीफ करनी पड़ेगी कि उन्होंने सत्ता में आते ही अपना रंग बदला और नए तरीके से सत्ता संचालन कर रही हैं। वे इस बात को बहुत जल्दी समझ गयीं कि नक्सलियों का जो इस्तेमाल होना था हो चुका और अब उनसे कड़ाई से ही बात करनी पड़ेगी। सही मायने में देश का नक्सल आंदोलन जिस तरह के भ्रमों का शिकार है और उसने जिस तरह लेवी वसूली के माध्यम से अपनी एक समानांतर अर्थव्यवस्था बना ली है, देश के सामने एक बड़ी चुनौती है। संकट यह है कि हमारी राज्य सरकारें और केंद्र सरकार कोई रास्ता तलाशने के बजाए विभ्रमों का शिकार है। नक्सल इलाकों का तेजी से विकास करते हुए वहां शांति की संभावनाएं तलाशनी ही होंगीं। नक्सलियों से जुड़े बुद्धिजीवी लगातार भ्रम का सृजन कर रहे हैं। वे खून बहाते लोगों में मुक्तिदाता और जनता के सवालों पर जूझने वाले सेनानी की छवि देख सकते हैं किंतु हमारी सरकार में आखिर किस तरह के भ्रम हैं? हम चाहते क्या हैं? क्या इस सवाल से जूझने की इच्छाशक्ति हमारे पास है?
देशतोड़कों की एकताः सवाल यह है कि नक्सलवाद के देशतोड़क अभियान को जिस तरह का वैचारिक, आर्थिक और हथियारों का समर्थन मिल रहा है, क्या उससे हम सीधी लडाई जीत पाएंगें। इस रक्त बहाने के पीछे जब एक सुनियोजित विचार और आईएसआई जैसे संगठनों की भी संलिप्पता देखी जा रही है, तब हमें यह मान लेना चाहिए कि खतरा बहुत बड़ा है। देश और उसका लोकतंत्र इन रक्तपिपासुओं के निशाने पर है। इसलिए इस लाल रंग में क्रांति का रंग मत खोजिए। इनमें भारतीय समाज के सबसे खूबसूरत लोगों (आदिवासियों) के विनाश का घातक लक्ष्य है। दोनों तरफ की बंदूकें इसी सबसे सुंदर आदमी के खिलाफ तनी हुयी हैं। यह खेल साधारण नहीं है। सत्ता,राजनीति, प्रशासन,ठेकेदार और व्यापारी तो लेवी देकर जंगल में मंगल कर रहे हैं किंतु जिन लोगों की जिंदगी हमने नरक बना रखी है, उनकी भी सुध हमें लेनी होगी। आदिवासी समाज की नैसर्गिक चेतना को समझते हुए हमें उनके लिए, उनकी मुक्ति के लिए नक्सलवाद का समन करना होगा। जंगल से बारूद की गंध, मांस के लोथड़ों को हटाकर एक बार फिर मांदर की थाप पर नाचते-गाते आदिवासी, अपना जीवन पा सकें, इसका प्रयास करना होगा। आदिवासियों का सैन्यीकरण करने का पाप कर रहे नक्सली दरअसल एक बेहद प्रकृतिजीवी और सुंदर समाज के जीवन में जहर घोल रहे हैं। जंगलों के राजा को वर्दी पहनाकर और बंदूके पकड़ाकर आखिर वे कौन सा समाज बनना चाहते हैं, यह समझ से परे है। भारत जैसे देश में इस कथित जनक्रांति के सपने पूरे नहीं हो सकते, यह उन्हें समझ लेना चाहिए। ममता बनर्जी ने इसे देर से ही सही समझ लिया है किंतु हमारी मुख्यधारा की राजनीति और देश के कुछ बुद्धिजीवी इस सत्य को कब समझेंगें, यह एक बड़ा सवाल है।

Friday, November 25, 2011

बाजार के खिलाफ प्रतिरोध की शक्ति बने मीडिया

‘लोक’ को संरक्षित करने से ही बचेगा भारत
-संजय द्विवेदी

भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो मृत्युंजय है। विश्व के अनेक विद्वानों, रहस्यदर्शियों, वैज्ञानिकों और प्रतिभावान शोधार्थियों ने भारत की अमरता को सिद्ध किया है। किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा तो किसी ने मोक्ष की, किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी कहा। किसी ने यहां आत्मिक पिपासा बुझाई तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ। कोई इसे मानवता का पालना मानता है तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा। ऐसी महान संस्कृति का आंगन भारत है जिसकी हर सांस में ही पूरी वसुधा को एक कुटुम्ब मानने की आकांक्षा है। अपनी इसी आकांक्षा के नाते यह देश कह पाया कि- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। दरअसल इसीलिए भारत मृत्युंजय है। वह वसुधा पर ऐसी संस्कृति का संवाहक है जो प्रेम, करूणा, संवेदना के भावों से भरी है और समूची मानवता के कल्याण के बात करती है।
ऐसी महान संस्कृति हमारे लिए प्रेरणा का कारण बनना चाहिए। किंतु गुलामी के लंबे कालखंड और विदेशी विचारों ने हमारे अपने गौरव ग्रंथों, मानबिंदुओं पर गर्द की चादर डाल दी। इस पूरे दृश्य को इतना धुंधला दिया गया कि हमें अपने गौरव का, अपने मान का, अपने ज्ञान का आदर ही न रहा। यह हर क्षेत्र में हुआ। हर क्षेत्र को विदेशी नजरों से देखा जाने लगा। हमारे अपने पैमाने और मानक भोथरे बना दिए गए। स्वामी विवेकानंद को याद करें वे उसी स्वाभिमान को जगाने की बात करते हैं। महात्मा गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण ने हमें उसी स्वत्व की याद दिलायी। सोते हुए भारत को जगाने और झकझोरने का काम किया।
ऐसे समय में जब एक बार फिर हमें अपने स्वत्व के पुर्नस्मरण की जरूरत है तो पत्रकारिता इसमें एक बड़ा साधन बन सकती है। हम देश में अपने नायकों की तलाश कर रहे हैं। वे हमारी जमीन के नायक हैं,इस देश के इतिहास के नायक हैं। पत्रकारिता की अपनी एक संस्कृति है। खासकर भारत के संदर्भ में पत्रकारिता लोकजागरण का ही अनुष्ठान है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ही देश में तेजी से पत्रकारिता का विकास हुआ और इसके चलते देशभक्ति, जनजागरण और समाज सुधार के भाव इसकी जड़ों में हैं। आजादी के बाद इसमें कुछ बदलाव आए और आज बाजारवादी शक्तियों का प्रभाव इस माध्यम पर काफी देखा जा रहा है। फिर भी सबसे प्रभावशाली संचार माध्यम होने के नाते मीडिया को इस तरह छोड़ देना संभव नहीं है। हमें उसकी भूमिका पर विचार करना ही होगा। हमें तय करना होगा किस तरह मीडिया लोकसंस्कारों को पुष्ट करते हुए अपनी जड़ों से जुड़ा रह सके। साहित्य हो या मीडिया दोनों का काम है, लोकमंगल के लिए काम करना। राजनीति का भी यही काम है। लोकमंगल हम सबका ध्येय है। लोकतंत्र का भी यही उद्देश्य है। संकट तब खड़ा होता है जब लोक हमारी नजरों से ओझल हो जाता है। लोक हमारे संस्कारों का प्रवक्ता है वह हमें बताता है कि क्या करने योग्य है और क्या करने योग्य नहीं है। इसलिए लोकमानस की मान्यताएं ही हमें संस्कारों से जोड़ती हैं और इसी से हमारी संस्कृति पुष्ट होती है।
मीडिया दरअसल एक ऐसी ताकत के रूप में उभरा है जो प्रभु वर्गों की वाणी बन रहा है, जबकि मीडिया की पारंपरिक संस्कृति और इतिहास इसे आम आदमी की वाणी बनने की सीख देते हैं। जाहिर तौर पर समय के प्रवाह में समाज जीवन के हर क्षेत्र में कुछ गिरावट दिख रही है। किंतु मीडिया के प्रभाव के मद्देनजर इसकी भूमिका बड़ी है। उसे लोक का प्रवक्ता होना चाहिए पर वह कारपोरेट और प्रभु वर्गों का प्रवक्ता बन जाता है। ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि हम इसकी सकारात्मक भूमिका पर विचार करें।
भारतीय संस्कृति में सामाजिक संवाद की अनेक धाराएं है। संवाद की परंपराएं हैं। शास्त्रार्थ हमारे लोकजीवन का हिस्सा है। समाज में विविध समाजों और रिश्तों के बीच संवाद की परंपराएं हैं। हमें उनपर ध्यान देने की जरूरत है। सुसंवाद से ही सुंदर समाज की रचना संभव है। मीडिया इसी संवाद का केंद्र है। वह हमें भाषा भी सिखाता है और जीवन शैली को भी प्रभावित करता है। आज खासकर दृश्य मीडिया पर जैसी भाषा बोली और कही जा रही है उससे सुसंवाद कायम नहीं होता, बल्कि समाज में तनाव बढ़ता है। इसका भारतीयकरण करने की जरूरत है। हमारे जनमाध्यम ही इस जिम्मेदारी को निभा सकते हैं। वे समाज में मची होड़ और हड़बड़ी को एक सहज संवाद में बदल सकते हैं।
कोई भी समाज सिर्फ आधुनिकताबोध के साथ नहीं जीता, उसकी सांसें तो ‘लोक’ में ही होती हैं। भारतीय जीवन की मूल चेतना तो लोकचेतना ही है। नागर जीवन के समानांतर लोक जीवन का भी विपुल विस्तार है। खासकर हिंदी का मन तो लोकविहीन हो ही नहीं सकता। हिंदी के सारे बड़े कवि तुलसीदास, कबीर, रसखान, मीराबाई, सूरदास लोक से ही आते हैं। नागरबोध आज भी हिंदी जगत की उस तरह से पहचान नहीं बन सका है। भारत गांवों में बसने वाला देश होने के साथ-साथ एक प्रखर लोकचेतना का वाहक देश भी है। आप देखें तो फिल्मों से लेकर विज्ञापनों तक में लोक की छवि सफलता की गारंटी बन रही है। बालिका वधू जैसे टीवी धारावाहिक हों या पिछले सालों में लोकप्रिय हुए फिल्मी गीत सास गारी देवे (दिल्ली-6) या दबंग फिल्म का मैं झंडू बाम हुयी डार्लिंग तेरे लिए इसका प्रमाण हैं। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं।
किंतु लोकजीवन के तमाम किस्से, गीत-संगीत और प्रदर्शन कलाएं, शिल्प एक नई पैकेजिंग में सामने आ रहे हैं। इनमें बाजार की ताकतों ने घालमेल कर इनका मार्केट बनाना प्रारंभ किया है। इससे इनकी जीवंतता और मौलिकता को भी खतरा उत्पन्न हो रहा है। जैसे आदिवासी शिल्प को आज एक बड़ा बाजार हासिल है किंतु उसका कलाकार आज भी फांके की स्थिति में है। जाहिर तौर पर हमें अपने लोक को बचाने के लिए उसे उसकी मौलिकता में ही स्वीकारना होगा। हजारों-हजार गीत, कविताएं, साहित्य, शिल्प और तमाम कलाएं नष्ट होने के कगार पर हैं। किंतु उनके गुणग्राहक कहां हैं। एक विशाल भू-भाग में बोली जाने वाली हजारों बोलियां, उनका साहित्य-जो वाचिक भी है और लिखित भी। उसकी कलाचेतना, प्रदर्शन कलाएं सारा कुछ मिलकर एक ऐसा लोक रचती है जिस तक पहुंचने के लिए अभी काफी समय लगेगा। लोकचेतना तो वेदों से भी पुरानी है। क्योंकि हमारी परंपरा में ही ज्ञान बसा हुआ है। ज्ञान, नीति-नियम, औषधियां, गीत, कथाएं, पहेलियां सब कुछ इसी ‘लोक’ का हिस्सा हैं। हिंदी अकेली भाषा है जिसका चिकित्सक भी ‘कविराय’ कहा जाता था। बाजार आज सारे मूल्य तय कर रहा है और यह ‘लोक’ को नष्ट करने का षडयंत्र है। यह सही मायने में बिखरी और कमजोर आवाजों को दबाने का षडयंत्र भी है। इसका सबसे बड़ा शिकार हमारी बोलियां बन रही हैं, जिनकी मौत का खतरा मंडरा रहा है। मुख्यधारा मीडिया के मीडिया के पास इस संदर्भों पर काम करने का अवकाश नहीं है। किंतु समाज के प्रतिबद्ध पत्रकारों, साहित्यकारों को आगे आकर इस चुनौती को स्वीकार करने की जरूरत है क्योंकि ‘लोक’ की उपेक्षा और बोलियों को नष्ट कर हम अपनी प्रदर्शन कलाओं, गीतों, शिल्पों और विरासतों को गंवा रहे हैं। जबकि इसके संरक्षण की जरूरत है। संस्कृति अलग से कोई चीज नहीं होती, वह हमारे समाज के सालों से अर्जित पुण्य का फल है। इसे बचाने के लिए, संरक्षित करने के लिए और इसके विकास के लिए समाज और मीडिया दोनों को साथ आना होगा। तभी हमारे गांव बचेगें, लोक बचेगा और लोक बच गया तो संस्कृति बचेगी।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

बिरथ आडवाणी की बेबसी !

एक अनथक यात्री के हौसलों को सलाम कीजिए
-संजय द्विवेदी


जिस आयु में लोग डाक्टरों की सलाहों और अस्पताल की निगरानी में ज्यादा वक्त काटना चाहते हैं, उस दौर में लालकृष्ण आडवानी ही हिंदुस्तान की सड़कों पर सातवीं बार देश को मथने-झकझोरने-ललकारने के लिए निकल सकते हैं। वे इस बार भी निकले और पूरे युवकोचित उत्साह के साथ निकले। परिवार और पार्टी की सलाहों, मीडिया की फुसफुसाहटों को छोड़िए, उस हौसले को सलाम कीजिए, जो इन विमर्शों को काफी पीछे छोड़ आया है।
प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के बीच उनका नाम वैसे भी सर्वोच्च है, यह यात्रा एक राजनीतिक प्रसंग है, जिसे ऐसी बातों से हल्का न कीजिए। बस यह देखिए कि अन्ना हजारे, रामदेव और श्रीश्री रविशंकर के अराजनीतिक हस्तक्षेपों के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ के यह अकेली सबसे प्रखर राजनीतिक आवाज है। यह उस पार्टी के लिए भी एक पाठ है जो भावनात्मक सवालों के इर्द-गिर्द ही अपना जनाधार खोजती है। आडवानी की यह सातवीं यात्रा थी, जिसमें वे देश के सबसे ज्वलंत प्रश्न पर बात कर रहे थे। यह इसलिए भी क्योंकि इस सवाल पर उनकी खुद की पार्टी भी बहुत सहज नहीं है। उनकी इस यात्रा को प्रारंभ से झटके लगने शुरू हो गए, क्योंकि एक राजनीतिक वर्ग और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा उनके इस प्रयास को 7- रेसकोर्स की तैयारी के रूप में देख रहा था। इससे यात्रा के प्रभाव को कम करने और आडवाणी के कद के नापने की कोशिशें हुयीं। जो निश्चय ही इस यात्रा के आभामंडल को कम करने वाले साबित हुए। आडवाणी जी अब जबकि 40 दिनों में 22 राज्यों की यात्रा कर लौट आए हैं तब सवाल यह उठता है कि आखिर इस यात्रा से इतनी घबराहटें क्यों थीं? क्या यात्रा के लिए जो समय, स्थान और विषय चुने गए वह ठीक नहीं थे? क्या अराजनीतिक क्षेत्र को भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरी पहल सौंप देना और मुख्य विपक्षी दल के नाते भाजपा का कोई हस्तक्षेप न करना उचित होता ?
एक राजनीतिक दल के सर्वोच्च नेता होने के नाते आडवाणी ने जो किया, वह वास्तव में साहसिक और सुनियोजित यत्न था। किंतु अनेक तरीके से उनकी यात्रा से उपजे सवालों के बजाए, वही सवाल उठाए गए, जिसमें मीडिया रस ले सकता था, या भाजपा की अंतर्कलह को स्थापित की जा सकती थी। भाजपा में लालकृष्ण आडवानी का जो कद और प्रतिष्ठा है उसके मुकाबले वास्तव में कोई नेता नहीं हैं, क्योंकि आडवानी ही इस नई भाजपा के शिल्पकार हैं। उनके प्रयत्नों ने ही देश की एक सामान्य सी पार्टी को सर्वाधिक जनाधारवाली पार्टी में तब्दील कर दिया। भाजपा का भौगोलिक और वैचारिक विस्तार भी उनके ही प्रयत्नों की देन है। अटलबिहारी वाजपेयी के रूप में जहां भाजपा के पास एक ऐसा नेता मौजूद था, जिसने संसद के अंदर-बाहर पार्टी को व्यापकता और स्वीकृति दिलाई, वहीं आडवाणी ने इस जनाधार में काडर खोजने व खड़ा करने का काम किया। अटल जी की व्यापक लोकस्वीकृति और आडवाणी का संगठन कौशल मिलकर जहां भाजपा को शिखर तक ले जानेवाले साबित हुए वहीं केंद्र में उसकी सरकार बनने से वह सत्ता का दल भी बन सकी। भाजपा का केंद्रीय सत्ता में आना एक ऐसा सपना था जिसका इंतजार उसका काडर सालों से कर रहा था। 1984 के चुनाव में मात्र दो लोकसभा सदस्यों के साथ संसद में प्रवेश करनी वाली भाजपा अगर आज देश का मुख्य विपक्षी दल है तो इसकी कल्पना आप आडवाणी को माइनस करके नहीं कर सकते।
रामरथ यात्रा के माध्यम से पहली बार देश की जनता के बीच गए लालकृष्ण आडवाणी की, देश को झकझोरने की यह कोशिशें तब से जारी हैं। 1990 की राम रथ यात्रा का यह यात्री लगातार देश को मथ रहा है। उसके बाद जनादेश यात्रा, सुराज यात्रा, स्वर्णजयंती यात्रा, भारत उदय यात्रा, भारत सुरक्षा यात्रा, जनचेतना यात्रा की पहल बताती है कि आडवाणी अपने दल के विचार को जनता के बीच ले जाने के लिए किस तरह की वैचारिक छटपटाहट के शिकार हैं। वे जनप्रबोधन का कोई अवसर नहीं छोड़ते। राममंदिर के बहाने छद्मधर्मनिरपेक्षता पर उनके द्वारा किए जाने वाले वाचिक हमलों को याद कीजिए और यह भी सोचिए कि वे किस तरह देश को अपनी बात से सहमत करते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाते हैं। वे जनता के साथ सीधे संवाद में अटलबिहारी वाजपेयी की तरह शब्दों के जादूगर भले न हों किंतु उनकी बात नीचे तक पहुंची और स्वीकारी गयी। क्योंकि वाणी और कर्म का साम्य उनमें बेतरह झलकता है। इसलिए जब वे कुछ कहते हैं, तो सामान्य प्रबोधन की शैली के बावजूद उनको ध्यान से सुना जाता है। वे लापरवाही से सुने जा सकने वाले नेता नहीं हैं। वे प्रबोधन के कलाकार हैं। वे विचार का पाठ पढ़ाते हैं और देश को अपने साथ लेना चाहते हैं। उनके पाठ इसलिए मन में उतरते हैं और जगह बनाते हैं।
अपनी वैचारिक दृढ़ता के नाते वे भाजपा के सबसे कद्दावर नेता ही नहीं, आरएसएस के भी लंबे समय तक चहेते बने रहे। क्योंकि वे स्वयं भाजपा का सबसे प्रामाणिक और वैचारिक पाठ थे। वे दल की विचारधारा और संगठन की मूल वृत्ति के प्रतिनिधि थे। अटलबिहारी वाजपेयी जहां अपनी व्यापक लोकछवि के चलते पार्टी का सबसे जनाधार वाला चेहरा बने वहीं, आडवानी विचार के प्रति निष्ठा के नाते दल का संगठनात्मक चेहरा बन गए, विचार पुरूष बन गए। पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जो कुछ उन्होंने लिखा और कहा, कल्पना कीजिए यह काम अटलबिहारी वाजपेयी ने किया होता तो क्या इसकी इस तरह चर्चा होती। शायद नहीं, क्योंकि उनकी छवि एक ऐसे भावुक-संवेदनशील नेता की थी जिसके लिए अपनी भावनाओं के उद्वेग को रोक पाना संभव नहीं होता था। किंतु आडवानी में संघ परिवार एक सावधान स्वयंसेवक, नपा-तुला बोलने वाला,पार्टी की वैचारिक लाईन को आगे बढ़ाने वाला, उस पर डटकर खड़ा होने वाले व्यक्ति की छवि देखता था। किंतु पाकिस्तान यात्रा ने कई भ्रम खड़े कर दिए। आडवानी का पारंपरिक आभामंडल दरक चुका था। वे आंखों के तारे नहीं रहे। यह क्यों हुआ, यह एक लंबी कहानी है। किंतु समय ने साबित किया कि किस तरह एक विचारपुरूष और संगठन पुरूष स्वयं अपने बनाए मानकों का ही शिकार हो जाता है। विचार के प्रति दृढ़ता और विचारधारा के प्रति आग्रह आडवानी ने ही अपने दल को सिखाया था, पाकिस्तान से लौटे तो यह फार्मूला उन पर ही आजमाया गया, उन्हें पद छोड़ना पड़ा। किंतु आडवानी की जिजीविषा और दल के लिए उनका समर्पण बार-बार उन्हें मुख्यधारा में ले आता है। वे पार्टी की तरफ से 2009 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए। पार्टी चुनाव हारी। चुनाव में हार-जीत बड़ी बात नहीं किंतु यह दूसरी हार(2004 और 2009) भाजपा पचा नहीं पायी। इसने पूरे दल के आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया। दिल्ली के स्तर पर परिवर्तन हुए, एक नई युवा भाजपा बनाने की कोशिशें भी हुयीं। किंतु आडवाणी की लंबी छाया से पार्टी का मुक्त होना संभव कहां था। सो उनकी छाया से मुक्त होने के प्रयासों ने विग्रहों को और बल दिया। आडवाणी मुख्यधारा में रहे हैं, नेपथ्य में रहना उन्हें नहीं आता। बस संकट यह है कि अटलबिहारी वाजपेयी के पास लालकृष्ण आडवानी थे किंतु जब आडवानी मैदान में थे तो उनके पास और पीछे कोई नहीं था। यह आडवानी की बेबसी भी है और पार्टी की भी। इसी बेबसी ने भाजपा और उसके रथयात्री को सत्ता के रथ से विरथ किया। किंतु आडवानी इस राजनीतिक बियाबान में भी अपनी कहने और सुनाने के लिए निकल पड़ते हैं,पार्टी पीछे से आती है, परिवार भी पीछे से आता है। किंतु कल्पना कीजिए इस यात्रा में अगर आडवाणी सरीखा उत्साह पूरा दल और संघ परिवार दिखा पाता तो क्या यह अकेली यात्रा पूरी सरकार पर भारी नहीं पड़ती। अन्ना और रामदेव के आंदोलनों को परोक्ष मदद देने के आरोपों से घिरा परिवार अगर आडवाणी की इस यात्रा में प्रत्यक्ष आकर वातावरण बनाता तो जाहिर तौर पर मीडिया को इस यात्रा से उपजे सवालों को नजरंदाज करने का अवकाश नहीं मिलता। किंतु विग्रह की खबरों के बीच इस यात्रा में उठाए जा रहे बड़े सवाल हवा हो गए। आडवाणी रथ पर थे, जनता भी साथ थी किंतु उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों के बजाए मोदी-आडवानी की दूरियां सुर्खियां बनीं। एक बेहद महत्वाकांक्षी राजनीतिक अभियान की यह बेबसी वास्तव में त्रासद है, किंतु लालकृष्ण आडवानी की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए वे अपनी बात कहने-सुनाने के लिए इस गगनविहारी और फाइवस्टारी राजनीति के दौर में भी सड़क के रास्ते जनता के पास जाने का हौसला रखते हैं। किसी गांव में जाने पर राहुल गांधी पर बलिहारी हो जाने वाले मीडिया को इस अनथक यात्री को हौसलों पर कुछ रौशनी जरूर डालनी चाहिए। यह भी सवाल उठाना चाहिए कि क्या आने वाले समय में हमारे राजनेता ऐसी कठिन यात्राओं के लिए हिम्मत जुटा पाएंगें?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

सीबीआई की तरह ‘अच्छा बच्चा’ नहीं है कैग

-संजय द्विवेदी
राजसत्ता का एक खास चरित्र होता है कि वह असहमतियों को बर्दाश्त नहीं कर सकती। हमने इस पैंसठ सालों में जैसा लोकतंत्र विकसित किया है, उसमें जनतंत्र के मूल्य ही तिरोहित हुए हैं। सरकार में आने वाला हर दल और उसके नेता हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को भोथरा बनाने के सारे यत्न करते हैं। आज कैग और विनोद राय अगर सत्तारूढ़ दल निशाने पर हैं तो इसीलिए क्योंकि वे सीबीआई की तरह ‘अच्छे बच्चे’ नहीं हैं।
न्यायपालिका भी सत्ता की आंखों में चुभ रही है और चोर दरवाजे से सरकार मीडिया के भी काम उमेठना चाहती है। कैग, सरकार और कांग्रेस के निशाने पर इसलिए है क्योंकि उसकी रिपोर्ट्स के चलते सरकार के ‘पाप’ सामने आ रहे हैं। सरकार को बराबर संकटों का सामना करना पड़ रहा है। यही कारण है कि सरकार और उससे जुड़े दिग्विजय सिंह,मनीष तिवारी जैसे नेता कैग की नीयत पर ही शक कर रहे हैं। उसकी रिपोटर्स को अविश्सनीय बता रहे हैं। किंतु सरकार से जुड़ी संवैधानिक संस्थाएं अगर सत्ता से जुड़े तंत्र की मिजाजपुर्सी में लग जाएंगी हैं तो आखिर जनतंत्र कैसे बचेगा। सीबीआई ने जिस तरह की भूमिका अख्तियार कर रखी है, उससे उसकी छवि पर ग्रहण लग चुके हैं। आज उसे उपहास के नाते कांग्रेस ब्यूरो आफ इन्वेस्टीगेशन कहा जाने लगा है। क्या कैग को भी सीबीआई की तरह की सरकार की मनचाही करनी चाहिए, यह एक बड़ा सवाल है। हमारे लोकतंत्र में जिस तरह के चेक और बैलेंस रखे गए वह हमारे शासन को ज्यादा पारदर्शी और जनहितकारी बनाने की दिशा में काम आते हैं। इसलिए किसी भी तंत्र को खुला नहीं छोड़ा जा सकता।
न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका में शक्तियों के बंटवारे के साथ-साथ, संसद के भीतर भी लोकलेखा समिति और तमाम समितियों में विपक्ष को आदर इसी भावना से दिया गया है। विरोधी विचारों का आदर और उनके विचारों का शासन संचालन में उपयोग यह संविधान निर्माताओं की भावना रही है। सब मिलकर देश को आगे ले जाने का काम करें यही एक भाव रहा है। तमाम संवैधानिक संस्थाएं और आयोग इसी भावना से काम करते हैं। वे सरकार के समानांतर, प्रतिद्वंदी या विरोधी नहीं हैं किंतु वे लोकतंत्र को मजबूत करने वाले और सरकार को सचेत करने वाले संगठन हैं। कैग भी एक ऐसा ही संगठन है। जिसका काम सरकारी क्षेत्र में हो रहे कदाचार को रोकने के लिए काम करना है। सीबीआई से भी ऐसी ही भूमिका की अपेक्षा की जाती है, किंतु वह इस परीक्षा में फेल रही है-इसीलिए आज यह मांग उठने लगी है कि सीबीआई को लोकपाल के तहत लाया जाए। निश्चय ही हम अपनी संवैधानिक संस्थाओं, आयोगों और विविध एजेंसियों को उनके चरित्र के अनुरूप काम नहीं करने देंगें तो लोकतंत्र कमजोर ही होगा। लोकतंत्र की बेहतरी इसी में है कि हम अपने संगठनों पर संदेह करने के बजाए उन्हें ज्यादा स्वायत्त और ताकतवर बनाएं। सरकार में होने का दंभ, पांच सालों का है किंतु विपक्ष की पार्टियां भी जब सत्ता में आती हैं तो वे भी मनमाना दुरूपयोग करती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देश के सबसे बड़े दल और लंबे समय तक राज करने वाली पार्टी ने ऐसी परंपराएं बना दी हैं, जिसमें संवैधानिक संस्थाओं का दुरूपयोग तो दिखता ही है। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने भी अपने पद की मर्यादा भुलाकर आचरण किया है। खासकर कांग्रेस के राज्यपालों के तमाम उदाहरण हमें ऐसे मिलेगें, जहां वे पद की गरिमा को गंवाते नजर आए। कैग ने अपनी थोड़ी-बहुत विश्वसनीयता बनाई है, चुनाव आयोग ने एक भरोसा जगाया है, कुछ राज्यों में सूचना आयोग भी बेहतर काम कर रहे हैं, हमें इन्हें संबल देना चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ न्यायपालिका की सक्रियता का स्वागत करना चाहिए। मीडिया की पहल को भी सराहना चाहिए न कि हमें इन संस्थाओं को शत्रु समझकर इनकी छवि खराब करने या इन्हें लांछित-नियंत्रित करने का प्रयास करने चाहिए।
सत्ता में बैठे लोगों को बराबर यह लगता है कि उन्हें जनादेश मिल चुका है और अब पांच सालों तक देश के भाग्यविधाता वे ही हैं। उनके राज करने के तरीके में सवाल उठाने का हक न हमारी संवैधानिक संस्थाओं को है, न मीडिया को, न ही अन्ना हजारे या रामदेव जैसे जनता के प्रतीकों को। जाहिर तौर पर जनतंत्र की यह विडंबना हम भुगत रहे हैं और इसके अतिरेक में ही हम देश में एक आपातकाल भी झेल चुके हैं। सत्ता को भोगने की यह सनक ही हमारे दिमागों पर इस तरह कायम है कि हमें उचित-अनुचित का विचार भी नहीं रहता।
आज की राजनीति सवालों के वाजिब समाधान नहीं खोजती वह विषय को और उलझाकर विषय का विस्तार कर देती है। जैसे आप देखें तो अन्ना हजारे और रामदेव की मंडली के द्वारा उठाए गए सवालों के हल तलाशने के बजाए सरकार और उनकी एजेंसियां इनसे जुड़े लोगों के ही चरित्र चित्रण में लग गयीं। अब टूजी स्पेट्रक्ट्रम का सवाल गहराया तो सरकार अपने लोगों को दागदार होता देखकर राजग के कार्यकाल के समय के स्पेक्ट्रम आबंटन पर एफआईआर करवा रही है। इससे पता चलता है सवालों के समाधान खोजने के बजाए इस पर जोर है कि आप भी दूध के धुले नहीं हो। कुल मिलाकर आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी रैली और संसद के सत्र में विपक्ष के हमलों को भोथरा करने की यह सोची समझी चाल है। कैग जैसे संगठन अगर इसका शिकार बन रहे हैं तो यह राजनीति का ऐसा चरित्र है जिसकी आलोचना होनी चाहिए।
( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Tuesday, March 22, 2011

उर्दू पत्रकारिता के भविष्य पर केंद्रित होगा मीडिया विमर्श का अगला अंक

भोपाल, 22 मार्च। देश में उर्दू पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। आजादी के आंदोलन से लेकर भारत के नवनिर्माण में उर्दू के पत्रकारों एवं उर्दू पत्रकारिता ने अपना योगदान देकर एक बड़ा मुकाम बनाया है। आज जबकि देश की तमाम भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता प्रगति कर रही है और अपने पाठक वर्ग का निरंतर विस्तार कर रही है किंतु उर्दू पत्रकारिता इस दौड़ में पिछड़ती दिख रही है।
नए जमाने की चुनौतियों और अपनी उपयोगिता के हिसाब से ही भाषाएं अपनी जगह बनाती हैं। ऐसे में उर्दू पत्रकारिता के सामने क्या चुनौतियां हैं, वह किस तरह स्वयं को संभालकर आज के समय को संबोधित करते हुए जनाकांक्षाओं की पूर्ति कर सकती है- इन प्रश्नों पर बातचीत बहुत प्रासंगिक है।
पिछले पांच सालों से सतत प्रकाशित देश की चर्चित मीडिया पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ अपना अगला अंक ‘उर्दू पत्रकारिता का भविष्य’ पर केंद्रित कर रही है। इस अंक के अतिथि संपादक प्रख्यात उर्दू पत्रकार एवं लेखक श्री तहसीन मुनव्वर होगें। उम्मीद है इस बहाने हम उर्दू पत्रकारिता के भविष्य और वर्तमान को सही तरीके से रेखांकित किया जा सकेगा। इस अंक के लिए लेखक अपनी रचनाएं 15 अप्रैल,2011 तक भेज सकते हैं। अंक से संबंधित किसी जानकारी के लिए पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी के फोन नंबर-09893598888 अथवा उनके ई-मेल 123dwivedi@gmail.com पर बातचीत की जा सकती है। संजय द्विवेदी का पता है- संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल-462011

उर्दू पत्रकारिता के भविष्य पर केंद्रित होगा मीडिया विमर्श का अगला अंक

भोपाल, 22 मार्च। देश में उर्दू पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। आजादी के आंदोलन से लेकर भारत के नवनिर्माण में उर्दू के पत्रकारों एवं उर्दू पत्रकारिता ने अपना योगदान देकर एक बड़ा मुकाम बनाया है। आज जबकि देश की तमाम भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता प्रगति कर रही है और अपने पाठक वर्ग का निरंतर विस्तार कर रही है किंतु उर्दू पत्रकारिता इस दौड़ में पिछड़ती दिख रही है।
नए जमाने की चुनौतियों और अपनी उपयोगिता के हिसाब से ही भाषाएं अपनी जगह बनाती हैं। ऐसे में उर्दू पत्रकारिता के सामने क्या चुनौतियां हैं, वह किस तरह स्वयं को संभालकर आज के समय को संबोधित करते हुए जनाकांक्षाओं की पूर्ति कर सकती है- इन प्रश्नों पर बातचीत बहुत प्रासंगिक है।
पिछले पांच सालों से सतत प्रकाशित देश की चर्चित मीडिया पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ अपना अगला अंक ‘उर्दू पत्रकारिता का भविष्य’ पर केंद्रित कर रही है। इस अंक के अतिथि संपादक प्रख्यात उर्दू पत्रकार एवं लेखक श्री तहसीन मुनव्वर होगें। उम्मीद है इस बहाने हम उर्दू पत्रकारिता के भविष्य और वर्तमान को सही तरीके से रेखांकित किया जा सकेगा। इस अंक के लिए लेखक अपनी रचनाएं 15 अप्रैल,2011 तक भेज सकते हैं। अंक से संबंधित किसी जानकारी के लिए पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी के फोन नंबर-09893598888 अथवा उनके ई-मेल 123dwivedi@gmail.com पर बातचीत की जा सकती है। संजय द्विवेदी का पता है- संजय द्विवेदी, अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल-462011

Saturday, August 7, 2010

वार्षिकांक का संपादकीय- एक सार्थक विमर्श के चार कदम


-डा. श्रीकांत सिंह
एक व्‍यापक वैचारिक प्रक्रिया में चार वर्ष की कालावधि बहुत ज्‍यादा मायने नहीं रखती। जब प्रश्‍न मीडिया जैसे अत्‍यंत जटिल विषय का हो, जिसमें जीवन और समाज के प्राय सभी अंश समाहित होते हैं, तब तो उसकी विराटता कल्‍पना से परे है। अपने प्रभाव और अपनी पहुंच के कारण ‘मीडिया’ जिस तरह एक शक्ति स्रोत के रूप में समाज में प्रस्‍थापित है, उसे देखते हुए ऐसी वैचारिक प्रक्रिया और भी कठिन हो जाती है। खासकर तब जबकि उसमें आत्‍मचिंतन और आत्‍ममंथन जैसे अवयव समाहित हों।

ऐसे शक्तिशाली स्‍वरूप वाले मीडिया को विमर्श के साथ बांधकर, मूल्‍य न्‍याय, नीतियों और सिद्धांत की चर्चा करने का विनम्र किन्‍तु दुस्‍साहसी प्रयास चार वर्ष पूर्व ‘मीडिया विमर्श’ ने प्रारंभ किया था। इन चार सालों में पहुंच और भेदन क्षमता के मीडिया की शक्ति तथा प्रभावोत्‍पादकता भी बढ़ गई है। यह भी देखने में आया है कि मीडिया ने अपनी व्‍यापकता के कारण समाज में महत्‍वपूर्ण अवसरों पर निर्णायक भूमिका निभाई है। विभिन्‍न रूपों में मीडिया के ऐसे कई स्‍तुत्‍य प्रयास सामने आए हैं, जिनके कारण मीडिया के प्रति आस्‍था और श्रद्धा इजाफा हुआ है।

लेकिन सब कुछ सकारात्‍मक ही हुआ हो, ऐसा नहीं है। मीडिया में विस्‍तारवाद, आपसी प्रतिस्‍पर्धा और बाजारवाद बढ़ा है। इस कारण मीडिया कई नैतिक प्रश्‍नों के लिए जवाबदेह हो गया है। मीडिया की नई भूमिका के कारण कई आधारभूत मूल्‍य अपने औचित्‍य पर लगे प्रश्‍न चिन्हों की ओर अचंभित होकर देख रहे हैं। आस्‍था और श्रद्धा बढ़ी है, लेकिन विश्‍वास डगमगा गया है। अन्‍य बाजारू चीजों की तरफ समाचारों और सूचनाओं की खरीद-फरोख्‍त के कारण मीडिया पर मंडी बनने का खतरा गहराने लगा है। निर्णय करना कठिन है कि अच्‍छाई का पलड़ा भारी है या बुराई का। यह भी निर्णय कठिन है कि समाज को सकारात्‍मक बनाने में मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई है या नकारात्‍मक बनाने में। यह भी तौला जाने लगा है कि समाज के कारण मीडिया कितना सशक्‍त हुआ है और मीडिया के कारण समाज कितना।

ऐसे प्रश्‍नों को देखकर लगता है कि ‘विमर्श’ की जरूरत पहले से और ज्‍यादा बढ़ गई है। मीडिया को लेकर चिंताओं का दायरा लगातार घनीभूत होता जा रहा है। मीडिया में काम कर रहे साथी भी अब मीडिया के इस स्‍वरूप को लेकर चिंतित और बहुत हद तक भयभीत हैं।चिंतन की सकारात्‍मक पहल जो पहले ऐच्छिक थी, अब अनिवार्यता से तब्‍दील होती जा रही है। ऐसे में ‘मीडिया विमर्श’ अपने अस्तित्‍व और औचित्‍य में, अधिक प्रासंगिक हो गया है। चार साल के अंतराल के बाद पीछे मुड़कर देखना अच्‍छा लगता है। कहां से चले थे, कहां आ गए और कहां जाएंगे जैसे विचार मन में कौंधने लगते हैं। समझ में आने लगता है कि जो कुछ किया, कहा, पाया वह कितना सही, कितना गलत था और कितना फासला तय करना है।

मीडिया विमर्श के वार्षिकांक में एक बड़ी बहस क्या रोमन में लिखी जाए हिंदी ?


इस बार की आवरण कथा हैः हा! हा!! HINDI दुर्दशा देखि न जाई!!!
रायपुर।


मीडिया विमर्श का सितंबर, 2010 का अंक 15 अगस्त तक बाजार में आ जाएगा। इस अंक में एक बड़ी बहस है कि क्या रोमन में लिखी जाए हिंदी। सितंबर के महीने की 14 तारीख को पूरा देश हिंदी दिवस मनाता है। इस वार्षिक कर्मकांड को जाने दें तो भी हम अपने आसपास रोजाना हिंदी की दैनिक दुर्दशा का आलम देखते हैं। ऐसे में हिंदी की ताकत, वह आम जनता ही है जो इसमें जीती, बोलती और सांस लेती है। बाजार भी इस जनता के दिल को जीतना चाहता है इसलिए वह उसकी भाषा में बात करता है। यह हिंदी की ताकत ही है कि वह श्रीमती सोनिया गांधी से लेकर कैटरीना कैफ सबसे हिंदी बुलवा लेती है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या हिंदी सिर्फ वोट मांगने और मनोरंजन की भाषा रह गयी है। इन मिले-जुले दृश्यों से लगता है कि हिंदी कहीं से हार से रही है और अपनों से ही पराजित हो रही है।
इन हालात के बीच हिंदी के विख्यात लेखक एवं उपन्यासकार श्री असगर वजाहत ने हिंदी को देवनागरी के बजाए रोमन में लिखे जाने की वकालत कर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। श्री वजाहत ने देश के प्रमुख हिंदी दैनिक जनसत्ता में 16 और 17 मार्च,2010 को एक लेख लिखकर अपने तर्क दिए हैं कि रोमन में हिंदी को लिखे जाने से उसे क्या फायदे हो सकते हैं। जाहिर तौर पर हिंदी का देवनागरी लिपि के साथ सिर्फ भावनात्मक ही नहीं, कार्यकारी रिश्ता भी है। श्री वजाहत की राय पर मीडिया विमर्श ने अपने इस अंक में देश के कुछ प्रमुख पत्रकारों, संपादकों, बुद्धिजीवियों, प्राध्यापकों से यह जानने की कोशिश की कि आखिर असगर की बात मान लेने में हर्ज क्या है। हिंदी दिवस के प्रसंग को ध्यान में रखते हुए यह बहस एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु है जिससे हम अपनी भाषा और लिपि को लेकर एक नए सिरे से विचार कर सकते हैं। इस बहस को ही हम इस अंक की आवरण कथा के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। आवरण कथा की शुरूआत में श्री असगर वजाहत का लेख जनसत्ता से साभार लिया गया है, इसके साथ इस विमर्श में शामिल हैं- वरिष्ठ पत्रकार एवं छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी के निदेशक रमेश नैयर, हिंदी के चर्चित कवि अष्टभुजा शुक्ल, दैनिक भास्कर-नागपुर के संपादक प्रकाश दुबे, देशबंधु के पूर्व संपादक बसंत कुमार तिवारी, नवभारत- इंदौर के पूर्व संपादक प्रो. कमल दीक्षित, प्रख्यात कवि-कथाकार प्रभु जोशी, हिंदी की प्राध्यापक डा. सुभद्रा राठौर।
इसके अलावा नक्सलवाद को बौद्धिक समर्थन पर प्रख्यात लेखिका अरूंधती राय के अलावा कनक तिवारी, संजय द्विवेदी, साजिद रशीद के लेख प्रकाशित किए गए हैं।जिसमें लेखकों ने पक्ष विपक्ष में अपनी राय दी है। इसके अलावा अन्य कुछ लेख भी इस अंक का आकर्षण होंगें। पत्रिका के इस अंक की प्रति प्राप्त करने के लिए 25 रूपए का डाक टिकट भेज सकते हैं। साथ ही वार्षिक सदस्यता के रूप में 100 रूपए मनीआर्डर या बैंक ड्राफ्ट भेज कर सदस्यता ली जा सकती है। पत्रिका प्राप्ति के संपर्क है-
संपादकः मीडिया विमर्श, 328, रोहित नगर,
फेज-1, ई-8 एक्सटेंशन, भोपाल- 39 (मप्र)

Thursday, July 8, 2010

इस कठिन समय में उनके बिना


राष्ट्रवादी पत्रकारिता के प्रमुख हस्ताक्षर थे रामशंकर अग्निहोत्री
-संजय द्विवेदी
वे राममंदिर के आंदोलन के व्यापक असर के दिन थे। 1990 के वे दिन आज भी सिरहन से भर देते हैं। तभी मैंने पहली बार वरिष्ठ पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री को विश्व संवाद केंद्र, लखनऊ के पार्क रोड स्थित दफ्तर में देखा था। आयु पर उनका उत्साह भारी था। उनके जीवन के लक्ष्य तय थे। विचारधारा उनकी प्रेरणा थी और कर्म के प्रति समर्पण उनका संबल। वे जानते थे वे किस लिए बने हैं और वे यह भी जानते थे कि वे क्या कर सकते हैं। तब से लेकर रायपुर, भोपाल और दिल्ली की हर मुलाकात में उन्होंने यह साबित किया कि वे न तो थके हैं न ही हारे हैं।
बुधवार सुबह जब रायपुर से डा. शाहिद अली का फोन आया कि अग्निहोत्री जी नहीं रहे तो सहसा इस सूचना पर भरोसा नहीं हुआ। क्योंकि उनकी गति और त्वरा कहीं से कम नहीं हुयी थी, इस विपरीत समय में भी और अपनी बढ़ती आयु के चलते भी। काम करने के अंदाज और तेजी से कहीं भी जा पहुंचने में वे हम नौजवानो से होड़ लेते थे। हम सोचते थे यह आदमी ऐसा क्यूं है। लेकिन पिछले साल जब मध्यप्रदेश की सरकार ने उन्हें अपने प्रतिष्ठित माणिकचंद्र वाजपेयी सम्मान से अलंकृत किया और उस मौके पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की मौजूदगी में पूर्व सरसंघचालक के.सी.सुदर्शन ने जो कुछ उनके बारे में कहा उसने कई लोगों के भ्रम दूर कर दिए। श्री सुदर्शन ने स्वीकार किया कि वे श्री अग्निहोत्री के ही बनाए स्वयंसेवक हैं और उनके एक वाक्य – “संघ तुमसे सब करवा लेगा” ने मुझे प्रचारक निकलने की प्रेरणा दी। यह एक ऐसा स्वीकार था जो रामशंकर अग्निहोत्री की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता को जताने के लिए पर्याप्त था। यह बात यह भी साबित करती है कि अगर वे चाहते तो कोई भी उंचाई पा सकते थे किंतु उन्होंने जो दायित्व उन्हें मिला उसे लिया और प्रामणिकता से उसे पूरा किया। आज की राजनीति में पदों की दौड़ में लगे लोग उनसे प्रेरणा ले सकते हैं।
4 अप्रैल, 1926 को मप्र के सिवनी मालवा में जन्में श्री अग्निहोत्री की जिंदगी एक ऐसे पत्रकार का सफर है जिसने कभी मूल्यों से समझौता नहीं किया। वे अपनी युवा अवस्था में जिस विचार से जुड़े उसके लिए पूरी जिंदगी होम कर दी। विचारधारा और लक्ष्यनिष्ठ जीवन के वे ऐसे उदाहरण थे जिस पर पीढ़ियां गर्व कर सकती हैं। पांचजन्य, राष्ट्रधर्म, तरूण भारत, हिंदुस्तान समाचार, आकाशवाणी, युगवार्ता वे जहां भी रहे राष्ट्रवाद की अलख जगाते रहे। उनका खुद का कुछ नहीं था। देश और उसकी बेहतरी के विचार उनकी प्रेरणा थे। राजनीति के शिखर पुरूषों की निकटता के बावजूद वे कभी विचलित होते नहीं दिखे। युवाओं से संवाद की उनकी शैली अद्बुत थी। वे जानते थे कि यही लोग देश का भविष्य रचेंगें। रायपुर में हाल के दिनों में उनसे अनेक स्थानों पर, तो कभी डा. राजेंद्र दुबे के आवास पर जब भी मुलाकात हुयी उनमें वही उत्साह और अपने लिए प्यार पाया। वे सदैव मेरे लिखे हुए पर अपनी सार्थक टिप्पणी करते। अपने विचार परिवार के प्रति उनका मोह बहुत प्रकट था। संपर्कों के मामले में उनका कोई सानी न था। पहली मुलाकात में ही आपका परिचय और फोन नंबर सब कुछ उनके पास होता था और वे वक्त पर आपको तलाश भी लेते। मैंने पाया कि उनमें बढ़ी आयु के बावजूद चीजों को जानने की ललक कम नहीं हुयी थी वे मुझे कभी विश्राम में दिखे ही नहीं। यह ऐसा व्यक्तित्व था जिसकी सक्रियता ही उसकी पहचान थी। हर आयोजन में वे आते और खामोशी से शामिल हो जाते। उन्हें इस बात की कभी परवाह नहीं थी उन्हें नोटिस भी किया जा रहा है या नहीं। मान-अपमान की परवाह उन्होंने कभी नहीं की, इस तरह के मिथ्या दंभ से दूर वे अपने बहुत कम आयु के हम जैसे नौजवानों के बीच भी खुद को सहज पाते तो सत्ता और शासन के शिखरों पर बैठे लोगों के बीच भी। जो व्यक्ति पांचजन्य का प्रबंध संपादक, राष्ट्रधर्म का संपादक, लगभग एक दशक नेपाल में एक हिंदी समाचार एजेंसी का संवाददाता रहा हो, हिंदुस्तान समाचार का प्रधानसंपादक और अध्यक्ष जैसे पदों पर रहा हो, जिसे भारतीय जनता पार्टी ही नहीं देश की राजनीति के प्रथम पंक्ति के सभी राजनेता प्रायः नाम से पुकारते हों, जिसने दर्जन भर देशों की यात्राएं की हों, साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में जिसकी एक बड़ी जगह हो। माधवराव सप्रे संग्रहालय,भोपाल से लेकर इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती जैसे संस्थाएं जिसे सम्मानित कर चुकी हों ऐसे व्यक्ति का इस कठिन समय में चला जाना वास्तव में एक बड़ा शून्य रच रहा है। वास्तव में वे एक ऐसे समय में हमसे विदा हुए हैं जब पत्रकारिता पर पेड न्यूज और राजनीति पर जनविरोधी आचरणों के आरोप हैं। देश अनेक मोर्चों पर कठिन लड़ाइयां लड़ रहा है चाहे वह महंगाई, आतंकवाद और नक्सलवाद की शक्ल में ही क्यों न हों। आज हम यह भी कह सकते हैं कि रामशंकर अग्निहोत्री अपने हिस्से का काम कर चुके हैं, पर क्या हमारी पीढ़ी में उनका उत्तराधिकार, उनकी शर्तों पर लेने का साहस है ? शायद नहीं, क्योंकि ये जगह सिर्फ उनकी है और इस विपरीत समय में सारे युद्ध हमें ही लड़ने हैं उनके बिना ही।

Saturday, July 3, 2010

बहादुर सेना, कमजोर सरकार और बेबस लोग !


देशतोड़क राजनीति से सावधान होने की जरूरत
- संजय द्विवेदी


दिल्ली में क्या इससे कमजोर सरकार कभी आएगी ? कमजोर इसलिए क्योंकि इस सरकार के लिए देश के सम्मान, देश की जनता के जान-माल और हमारे सेना-सुरक्षा बलों की जान की कोई कीमत नहीं है। हो सकता है कि हालात इससे भी बुरे हों। किंतु अब यह कहने में कोई संकोच नहीं कि दिल्ली में इतनी बेचारी, लाचार और कमजोर सरकार आज तक नहीं आयी। थोपे गए नेतृत्व और स्वाभाविक नेतृत्व का अंतर भी इसी परिघटना में उजागर होता है। दिल्ली में एक ऐसे आदमी को देश की कमान दी गयी है जो आर्थिक मामलों पर जब बोलता है तो दुनिया सुनती है (बकौल बराक ओबामा)। किंतु उसके अपने देश में पिछले छः सालों से उसके राज में महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा है किंतु वह आदमी अपने देश की महंगाई पर कुछ नहीं बोलता। परमाणु करार विधेयक पास कराने के लिए अपनी सरकार तक गिराने की हद तक जाने वाले हठी प्रधानमंत्री को इससे फर्क नहीं पड़ता कि उनकी सरकार के कार्यकाल में लोगों का जिंदगी बसर करना कितना मुश्किल है और कितने किसान उनके राज में आत्महत्या कर चुके हैं। यह एक ऐसी सरकार है जिसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता नहीं पिछले पांच सालों में अकेले नक्सली आतंकवाद में ग्यारह हजार लोग मारे जा चुके हैं। वह इस बात पर विमर्श में लगी है कि सेना का इस्तेमाल हो या न हो। क्या ऐसा इसलिए कि नक्सली आतंक एक ऐसे इलाके में है जहां आम आदिवासी रहते हैं जिन्हें मिटाने और समाप्त करने का साझा अभियान नक्सली नेताओं और सरकार ने मिलकर चला रखा है। झारखंड से लेकर बस्तर तक की जमीन जहां उसके असली मालिक वनपुत्र और आदिवासी रहते हैं, एक युद्ध भूमि में तब्दील हो गयी है। जहां विदेशी विचार(माओवाद) और विदेशी हथियारों से लैस लोग 2050 तक भारतीय गणतंत्र पर कब्जे का स्वप्न देख रहे हैं। फिर भी हमारी सरकार को इस इलाके में सेना नहीं चाहिए। भले नक्सली तीन माह में सौ से ज्यादा सीआरपीएफ जवानों को अकेले बस्तर में ही न मार डालें। वे हजारों करोड़ की लेवी वसूलते हुए इन जंगलों में लैंड माइंस बिछाते रहें और हमारा राज्य रोम के जलने पर नीरो की तरह बांसुरी बजाता रहे।
अब थोड़ा देश के मस्तक पर नजर डाल लें। यह जम्मू कश्मीर का इलाका है जो कभी धरती का स्वर्ग कहा जाता था। आज इस क्षेत्र को हमारी सरकारों की घुटनाटेक और कायर नीतियों ने घरती के नरक में बदल दिया है। हमारी सेना के अलावा इस पूरे इलाके में भारत मां की जय बोलने वाला कोई नहीं बचा है। कश्मीर के पंडितों के विस्थापन के बाद इस पूरे इलाके में पाकपरस्त आतंकी संगठनों का हस्तक्षेप है। उनके रास्ते में सबसे बड़ी बाधक भारतीय सेना है। हमारी महान सरकार अब सेना के हाथ से भी कवच-कुंडल छीनने पर आमादा है ताकि कश्मीर में भारतीय राज्य की एक और पराजय सुनिश्चित की जा सके। इस काम में दिल्ली की सरकार बराबर की भागीदार है। कश्मीर के मुख्यमंत्री और उनके पिता का सर्वाधिक दबाव इस बात पर है कि आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट में बदलाव किया जाए। यह बदलाव क्यों किया जाए इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। किंतु बदलाव होने जा रहा है और प्रधानमंत्री ने उसे मंजूरी भी दे दी है। सेनाध्यक्षों के विरोध के बावजूद पाकिस्तान के झंडे और “गो इंडियंस” का बैनर लेकर प्रर्दशन करने वालों को खुश करने के लिए हमारी सरकार आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट में बदलाव करने जा रही है। यह एक ऐसी सूचना है जो हर भारतीय को हतप्रभ करने के लिए काफी है। देश के साठ सालों बाद भी हमारी सरकार अपनी ही सेना के खिलाफ खड़ी है। क्या भारतीय की राजनीति इतनी दिशाहारा और थकाहारा हो चुकी है? क्या हमारी सरकारें अपना विवेक खो चुकी हैं? वे सेना को मानवता और संवेदनशीलता सिखा रही है। नए बदलाव में सेना शत्रु को पकड़ने और गोली चलाने का अधिकार खो देगी। फिर सेना की जरूरत ही क्या है। ऐसे हालात में कहीं यह कश्मीर को पाक को सौंप देनी की एक लाचार कवायद तो नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ जब हमें कड़े संदेश देने की जरूरत है तब हम अपनी सेना को ही कमजोर बनाना चाहते हैं। सच्चाई तो यह है कि हमारी सेना ने अनेक अवसरों पर अपने अप्रतिम साहस के प्रदर्शन से भारत के मान को बचाया है।जबकि राजनैतिक नेतृत्व सदा जमीनें छोड़ता, युद्धबंदियों को छोड़ता और समझौते करता आया है। इन्हीं समझौतों और वोट की कथित लालच ने हमारे नेताओं को इतना बेचारा बना दिया है कि हमारे नेता ही कहते हैं कि अगर अफजल गुरू को फांसी दी गयी तो कश्मीर सुलग जाएगा। तो आप बताएं इस समय कश्मीर क्यों सुलग रहा है। किसे फांसी दी गयी है। कश्मीर के नेता भारत के साथ रहने की कीमत वसूल रहे हैं। उन्हें इस देश से कोई लेना-देना नहीं है। नहीं तो वे विस्थापित हिंदुओं की वापसी की बात क्यों नहीं करते, पर उन्हें तो सेना की वापसी चाहिए ताकि वे आराम से पाकिस्तानी हुक्मरानों की गोद में जा बैठें। जो अब्दुला परिवार सालों से कश्मीरी राजनीति का सिरमौर बना है, भारत ने उनका इतना सम्मान किया पर वे आज अफजल गुरू की फांसी रोकने की अपीलें कर रहे हैं। दूसरा मुफ्ती परिवार भारतीय संविधान की शपथ लेकर देश का गृहमंत्री बनता है तो अपनी ही बेटी का अपहरण करवाकर आतंकियों की रिहाई का नाटक रचता है। दुर्भाग्य से ऐसे ही लोग भारत भाग्य विधाता बनकर बैठे हैं। इसी तरह पूर्वांचल के सात राज्यों का बुरा हाल है। असम से लेकर मणिपुर तक बुरी खबरें हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों ने असम से लेकर पश्चिम बंगाल तक हालात बदतर कर रखें हैं। हमारी सरकारें उनकी मिजाजपुर्सी में लगी हैं। राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं को सिर्फ पांच साल और वोट बैंक दिखता है। सो वे घुसपैठियों के राशन कार्ड बनवाने, मतदाता परिचय पत्र बनवाने और अवैध बस्तियां बसाने में सहयोगी बनते हैं। जाहिर तौर पर इस देश की राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बहुत विकराल स्वरूप ले चुका है।
हम अपनी सेना और सुरक्षा बलों को लाचार बना कर पहले से तैयार बैठे शत्रुओं को अवसर सुलभ करा रहे हैं। अभी पाक प्रेरित आतंकवाद के लिए भी हमारी अपनी ताकत क्या है। हमारी सरकार को हर शिकायत लेकर अमरीका के दरबार में जाना पड़ता है। कल अगर सेना का भी मनोबल टूट गया तो उस दृश्य की कल्पना करना भी मुश्किल है कि हमारा क्या होगा। देश इस देश के लोगों का है, जो इसे बेबस निगाहों से देख रहे हैं। यह देश अगर दलित, मुस्लिम और ईसाई जैसी राजनीतिक बोलियों से चलाया जाएगा तो इसे कोई बचा नहीं सकता। शायद इसीलिए हम देश का तेजी से विघटन होता देख रहे है। यह विघटन चरित्र का है, नैतिकता का है, देशभक्ति का भी है। देश का राजनीतिक नेतृत्व किसी भी प्रकार का आर्दश प्रस्तुत कर पाने में विफल है। सारे संकटों में मौन ही हमारे राजनैतिक नेतृत्व का आर्दश बन गया है। आप देखें तो हाल के तीन बड़े संकटों भोपाल गैस त्रासदी, कश्मीर संकट और महंगाई पर देश की सबसे ताकतवर नेता सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी का कोई बयान नहीं आया है। ऐसा नेतृत्व क्या आपको संकटों से निजात दिला सकता है या आपकी जिंदगी के अँधेरों से मुक्ति दिला सकता है। प्रधानमंत्री से कोई उम्मीद करना तो व्यर्थ ही है क्योंकि उनकी नजर में हम भारत के लोगों का कोई मतलब नहीं है। ऐसे घने अंधेरे में आशा की कोई किरण नजर आती है तो वह शक्ति जनता के पास ही है कि वह अपने राजनीतिक नेतृत्व पर कोई ऐसा दबाव बनाए जिससे वह कम से कम देश के हितों, सुरक्षा के साथ सौदेबाजी न कर सके। देश में एक ऐसा अराजनैतिक अभियान शुरू हो जहां देश सर्वोपरि है, इस भावना का विस्तार हो सके। वरना हमारी राजनीति हमें यूं ही बांटती,तोड़ती और कमजोर करती रहेगी।